Thursday, May 27, 2010
कॉमनवेल्थ गेम्स में साहित्य का तड़का
नई दिल्ली। यदि भाषा वाध्यता के चलते आपने नाईजिरियाई सिमांडा अडिची की ‘द थिंग अराउंड योर नेक’, घाना की लेखिका आयशा हारूना अट्टा की ‘हरमैटन रेन’, सामोवा के लेखक अल्बर्ट वेंडि्ट की ‘द एडवेंचर ऑफ वेला’ के पढ़ने का आनंद नही ले पाए हैं तो अब परेशान होने की जरूरत नही है। आपकी इस समस्या का समाधान करने के लिए हिन्दी अकादमी सामने आयी है। अकादमी कॉमनवेल्थ देशों के साहित्यकारों व उनकी रचनाओं को हिन्दी में प्रकाशित करने की तैयारियों में जुट गयी है। इस योजना के पीछे अकादमी का उद्देश्य सभी सदस्य देशों को साहित्यिक रूप से एक दूसरे के निकट लाना है। कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान हिन्दी अकादमी अपनी त्रैमासिक पत्रिका ‘इंद्रप्रस्थ भारती’ का एक विशेष अंक प्रकाशित करने वाली है। इस विशेष अंक में कॉमनवेल्थ देशों के लोकप्रिय (मैग्सेसे, बुकर, नोवेल व उन देशों के राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित) लेखकों की कृतियों व उनके साक्षात्कार हिन्दी में प्रकाशित किए जाएंगे। इसके अलावा भारतीय साहित्य व साहित्यकारों से विशेष जुड़ाव रखने व अपनी भाषा में इन्हें बढ़ावा देने वाले विदेशी रचनाकारों को भी इस अंक में शामिल किया जाएगा। अकादमी के सचिव रवीन्द्र नाथ श्रीवास्तव ने बताया कि कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान प्रकाशित होने वाले इस विशेष अंक में उन विदेशी साहित्यकारों को भी शामिल किया जाएगा जिन्होंने साहित्य के विकास में सैद्धांतिक योगदान दिया है। इसके अलावा उन साहित्यकारों को भी शामिल किया जाएगा जिन्होंने किसी सांस्कृतिक सिद्धांत का प्रतिपादन किया हो या इसमें सहयोग दिया हो। रवीन्द्र नाथ श्रीवास्तव ने कहा कि उन देशों में जहां भारतीय भाषाएं बोलचाल में तो प्रयोग की जाती है लेकिन लिपी के रूप में किसी अन्य भाषा का प्रयोग किया जाता है, उन्हें भी वास्तविक पहचान दिलाने की पहल इस पत्रिका के माध्मय से की जाएगी। पत्रिका का उद्देश्य ऐसे साहित्यकारों को ढूंढकर भारतीय भाषाओं में साहित्य रचने के लिए प्रोत्साहित करना है। उन्होंने कहा कि नोवेल पुरस्कार विजेता वीएस नायपाल के साक्षात्कार के साथ-साथ उनके जैसे अन्य साहित्यकारों को इस विशेष अंक में विशेष स्थान दिया जाएगा। इसके लिए विदेशी भाषाओं के विशेषज्ञों की टीम बनायी गयी है।
Wednesday, April 7, 2010
57 फीसद ब्याज वसूलने की जानकारी रिजर्व बैंक को नहीं
आम आदमी को साहूकारों के चंगुल से बचाने के लिए सरकार बैंकों से लोन लेने की बात करती है लेकिन उसे यह नहीं मालूम कि निजी बैंक साहूकारों से दो कदम आगे निकल चुके हैं। निजी बैंक दिए गए लोन पर सलाना 58 फीसद तक ब्याज वसूल रहे हैं। इसकी जानकारी न तो रिजर्व बैंक को है और न ही प्रधानमंत्री कार्यालय और वित्त मंत्रालय को। इस बात का खुलासा एक आरटीआई में हुआ है। कन्हैया लाल नामक शख्स ने आईसीआईसीआई से 2006 में 35 हजार 900 रूपए का लोन लिया था, जिस पर बैंक ने 48.1 फीसद की दर से ब्याज वसूला। इसके बाद उन्होंने इंडिया बुल्स बैंक से 18 हजार का लोन लिया, जिस पर बैंक ने 57.22 फीसद ब्याज मांगा, जिसे उन्होंने देने से मना कर दिया। इस मामले में उन्होंने आरटीआई दायर कर रिजर्व बैंक से यह जानकारी मांगी कि कोई बैंक कितना ब्याज वसूल सकता है। कन्हैया लाल ने दिसम्बर 2007 को आरटीआई दायर कर प्रधानमंत्री कार्यालय से भी यही जानकारी मांगी। पीएमआ॓ ने श्रीलाल को जानकारी मुहैया कराने के लिए आरबीआई को पत्र लिखा। आरबीआई ने पत्र संख्या आरआई 5736/07.05.01/2007-08 (दिनांक 04/02/08) के माध्यम से कहा की पर्सनल लोन पर आईसीआईसीआई बैंक द्वारा वसूले जा रहे ब्याज के बारे में उसके पास कोई जानकारी नहीं है। कन्हैया लाल ने आरबीआई से यह भी जानना चाहा है कि जब उसने 16 नवम्बर 2006 के अपने पत्र में कहा कि ग्राहकों के शोषण के मामले प्राइवेट बैंक आगे हैं, यदि यह सही है तो फिर आईसीआईसीआई बैंक के सीईआ॓ केवी कामत को पद्मश्री पुरस्कार देने का निर्णय किसने लिया? उन्होंने यह भी जानना चाहा कि आईसीआईसीआई और इंडिया बुल्स बैंक सरकार को कितना आयकर चुकाते हैं। इन दोनों सवालों के जवाब में भी आरबीआई ने चुप्पी साध ली। कन्हैया लाल ने मनमानी ब्याज वसूलने के बारे में प्रधानमंत्री कार्यालय में भी आरटीआई दायर कर जबाव मांगा, जिसे प्रधानंमत्री कार्यालय ने पत्र संख्या आरटीआई/925/2007-पीएमए के माध्यम से भारत सरकार के वित्त सेवा विभाग को प्रेषित कर दिया। कन्हैया लाल ने इन दोनों बैंकों द्वारा उपभोक्ताओं से बेतहाशा ब्याज वसूले जाने की शिकायत राष्ट्रपति के अलावा उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सोनिया गांधी, राहुल गांधी, वित्त मंत्रालय, रिजर्व बैंक, बैंकिंग लोकपाल समेत लगभग तीन दर्जन से अधिक विभागों और अधिकारियों को पत्र लिख चुके हैं लेकिन पिछले लगभग चार वर्षो में उन्हें कहीं से संतोषजनक जवाब नहीं मिला है। कन्हैया लाल ने हार नहीं मानी है और पूरे मामले को कोर्ट में ले जाने का मन बनाया है।
Tuesday, March 23, 2010
लड़की होने का दर्द

अपनी इच्छाओं और सपनों को ध्वस्त होते मैं देखती रही थी, मूक दर्शक की तरह। यौवन की दहलीज पर कदम रखते ही हरेक लड़कियों की तरह मेरे भी कुछ अरमान दिल में हिलोरे लेने लगे थे। मैने भी अपने जीवन साथी की ए क धुंधली से तस्वीर अपने मन-मंदिर में बिठायी थी। ए कांत में अक्सर उस सपने के राजकुमार के ख्यालों में खो जाती थी। और जब सपना टूटता तो सोचती काश यह सपने सच होते। पर सपने तो सपने होते हैं, वो तो आंख खोलते ही पानी की बूंद के बुलबुले की तरह खत्म हो जाते हैं। मेरी अधिकतर सखियों की शादी हो चुकी थी शेष चंदा और रूपा ही बची थी, उनकी भी शादी तय हो चुकी थी। सभी सखियों का ससुराल अच्छा मिला था और उनके सपने का राजकुमार हकीकत के राजकुमार से अधिक मिलता जुलता हुआ था। वहीं मेरे सारे सपने आज टूट गये हैं। ए क कांच के घर की तरह जो समय की आंधी को भी नहीं सह सका और धूल में मिल गया। अपनी शादी की बात सुनकर मै कितनी खुश हुई थी। लगा था जैसे मेरा सपना अब सच होने वाला है। पर यह खुशी कु़छ ही पलों की थी। लोगों के मुंह से अपने होने वाले जीवन साथी के बारे में इस तरह(?) की बातें सुनकर। सारे सपने ए क वर्फ के टुकड़े की तरह सच्चाई की गर्मी से पिघल गये और शेष रह गया जमीन पर कीचड़ ही कीचड़। लगा जैसे मैं अपने ही परिवार के ऊपर आज तक बोझ थी और मेरी मां उस बोझ को उतार फेंकना चाहती थी और आज शायद वह अपने इस बोझ को उतार फेंकने में कामयाब भी हो गयी थीं। उसके इस कार्य में अस्पष्ट रूप से मेरे प्रिय भाई बबलू का भी पूरा-पूरा सहयोग था। मैं अच्छी तरह जानती थी कि अगर मेरा भाई चाहेगा ता उस जगह मेरी शादी नहीं होगी, पर वह भी शायद मुझे मेरी मां की तरह अपने घर से निकाल फेंकना चाहता था कूड़े करकट की तरह। इसका जिम्मेदार मैं बबलू को नहीं मानती, क्योंकि जब जननी ही मुझे अपने घर में शरण देना नही चाहती तो वह तो भाई था। अब सोचतीं हूं तो आंखों से आंसू नहीं थमते। पापा जब जिन्दा थे तो मेरी ए क मांग को पूरा करने के लिए क्या से क्या नहीं कर देते थे। मुझे अब भी अच्छी तरह याद है, मै अक्सर रूठ जाया करती थी तब पापा अपनी गोद में उठाकर मुझे मनाते थे, और घर के सभी लोगों को डांटते थे की कोई मेरे बेटे को कुछ नहंी कहेगा। पापा मुझे पूना बेटा कहकर बुलाते थे। पूना इसलिए की मेरा जन्म पूना शहर में हुआ था। जब तक पापा जिन्दा थे तब तक कभी भी मुझे किसी भी तरह की तकलीफ न होने दी और न ही कभी ए क पल भी उदास होने दिया। मेरी हर अच्छी बुरी मांगों को पापा ने पूरा किया। मेरी मां शुरू से ही मुझसे कुछ उखड़ी-उखड़ी सी रहती थी। जैसे मैं उनकी बेटी ही नहीं हूं। मै मम्मी के इस नाराजगी का कारण जानने की बहुत कोशिश करती रही पर कभी सफल न हो सकी। पापा के रहते हुए यह मेरी पहली असफलता थी। जिसकों मै चाह कर भी नहीं जान पायी थी। पापा को गुजरे आज पूरे पांच वर्ष बीत चुके हैं। इन पांच वर्षाे में अपने पापा की लाडली पूनम (पूना) अपने ही भाई-बहनों और मां की आंख की किरकिरी बन गई है। मां की तरह ही मेरा भाई बबलू मुझे ए क बकरी की तरह शादी के बहाने दूल्हे रूपी कसाई के हाथों बेंच देना चाहता था। कभी-कभी इच्छा होती कि अपने भाई से कहूं कि क्या तुम मेरे राखी का यही बदला चुका रहे हो? पर शर्मे के मारे चुप रह जाती थी। तब लगता था कि ए क लड़की कितनी बेवस होती है। उसकी इच्छाए ं कोई मायने नहीं रखती। न ही पिता के घर में न ही पति के घर में। दोनो ही घरों में वह केवल ए क काम करने वाली नौकरानी के रूप में ही इस्तेमाल होती रहती है। मेरी सहेली रूना की शादी इस साल होने वाली है। उसके लिए कितने ही लड़कों को देखा गया पर रूना हर लड़के में कोई न कोई खामी निकाल कर उसे नापसंद कर देती थी। हम सखियां जब उससे इस तरह से हर लड़के को नापसंद करने का कारण पूछती थी तो वह कितना ढिठाई से कहती ती कि जीवन तो मुझे गुजारना है उस लड़के के साथ और अगर मेरे मनपसंद का लड़का नहीं होगा तो मै कैसे उसके साथ अपनी जिन्दगी गुजारूगीं? रूना की इस तरह की बातों पर उसे कितना भला-बुरा हम सभी सखियां कहती थी। मेरी तो शर्म के मारे बुरा हाल हो जाता। रूना के इस तरह की बातें करने पर गांव वाले भी उसे संदेह की नजरों से देखते थे। गांव की बूढ़ी औरतें तो यह भी कहती थी कि यह फला लड़के से फंसी है और इस तरह की न जाने कितनी ही बातें रूना के बारे में आये दिन सुनने को मिलती थी। लेकिन ए क दिन रूना की शादी ए क अच्छे पढ़े-लिखे लड़के के साथ हुई, जिसके साथ वह मजे से जीवन गुजार रही है। आज जब अपने साथ होते हुए इस अन्याय को देखती हूं तो सोचती हू कि क्यों नही मै भी रूना की तरह हुई। क्यों नहीं मैं भी बेशर्म हो गई। अगर उस समय मै रूना की तरह बेशर्म हो गयी होती तो आज इस तरह से घुट-घुट कर जीना तो नहीं पड़ता। मै बचपन से ही जिद्दी किस्म की लड़की थी और मेरी सारी जिद को पापा ने पूरा किया था। आज इस शादी के शुभ अवसर पर पापा की याद आती है। मन करता है कि उड़कर पापा के पास जली जाऊं और उनकी गोद में छुप कर पूछूं कि क्या पापा आपकी बेटी इस लड़के के साथ सुखी जीवन गुजार सकती है? क्या आपने मुझे इसी दिन के लिए इतना बडा किया था? क्यों नहीं आपने मुझे मेरे पैदा होते ही गला घोंट कर मार दिया। अगर उस समय मेरी जीवन लीला समाप्त कर दिये होते तो आज आपकी लाडली बेटी को यह दिन नहीं देखना पड़ता और मैं फूट-फूटकर रोने लगी थी। बहुत देर तक रोती रही न जाने कब तक। आंख खुली तो सुबह की रोशनी चारों तरफ फैल चुकी थी। रोशनी में आंख खोला नहीं जा रहा था, लगता था जैेसे यह आंखे अंधेरे को सहने की आदी हो गयी हैं। मेरे पैदा होने के बाद मेरे घर में बहुत मन्नतों के बाद बबलू का जन्म हुआ था। उसके जन्म पर पापा ने पैसे को पानी की तरह बहा दिया था। हम चार बहनों के बाद बबलू पैदा हुआ था। पापा ने गांव में अष्टजाम करवाया था। गांव में धूम मच गयी थी। दादी ने मेरी पीठ पर लड्डू फोड़ी थी। सभी का मानना था कि मेरे पैदा होने से ही बबलू का जन्म हुआ है। उस समय परिवार के लिए लक्की थी, जिसके कारण मेरी हर अच्छी-बुरी इच्छाओं को पापा और दादी पूरा किया करते थे। लेकिन मां मुझसे नाराज रहती थी। लगता था जैसे मैने उनकी उच्छाओं के विपरीत उनके घर में जन्म ले लिया हो। जबकि मेरी इसमें कोई गलती नहीं थी। पापा के मरने के बाद मै ए क दम से अनाथ सी हो गयी। दादी पहले ही स्वर्ग सिधार चुकी थी। मै मां की उपेक्षाओं और ए क उम्मीद के साथ जीती रही थी कि मेरा भाई बबलू बडा होगा तो वह मेरी भावनाओं और इच्छाओं को अहमियत देगा। वही बबलू आज मेरे जीवन का सौदा करके आया है। वैसे मैने महसूस किया है कि बबलू भी इस रिश्ते से बहुत खुश नहीं है। लगता है जैसे उसे भी मेरी खुशियों का आभास है, पर पैसा खर्च न करना पड़े इसलिए वह मेरा रिश्ता तय कर आया है। मां और मेरी बड़ी बहन आरती के पति कृष्णा जीजा जी इस रिश्ते से बहुत खुश थे। जीजाजी नहीं चाहते थे कि मै उनके ससुराल में रहूं। क्योंकि मैने कभी उनकी शारीरिक भूख को शांत नहीं किया था। वह जब भी हमारे घर आते तो मुझसे अधिक मेरे शरीर से खेलना चाहते थे और अपनी हवश की आग को मेरे शरीर से शांत करना चाहते थे। जीजाजी के इस काम में मां भी थोड़ा बहुत सहयोग करती थी। जब जीजा जी की इस हरकत की शिकायत मां से करती तो वह कहती कि वह तुम्हारे जीजा जी ही तो हैं उनका इस तरह करने का हक है। वह मजाक में ए ेसा वैसा कुछ कर भी देते हैं तो क्या अंतर पड़ता है। वह तुम्हारी बहने के पति है तुमसे उनका हंसी मजाक का रिश्ता है। ए ेसा तो चलता ही रहता है। मां की इन बातों को सुनकर मैं सन्न रह जाती। सोचती जब बाड़ ही खेत को खाने लगे तो औरों से क्या शिकायत करना। मै चुपचाप अपने कमरे में आकर रोने लगती, बहुत देर तक रोती रहती। सोचती अब मै अपने ही घर में बेगानी हूं। मेरी बातों को सुनने वाला कोई नहीं है। अपने साथ होते इस व्यवहार को सहती रही कभी ऊफ तक नही की। फिर भी मां मुझसे सीधे मुंह बात नहीं करती थी। हरदम गाली से ही बात शुरू करती थी। मुझसे दो बहनें सुमन और निशा छोटी थी पर कभी भी मां या बबलू उन दोनों से कुछ भी नही कहते थे। मै ही सारा काम करती थी। खाना बनाने से लेकर सभी का कपड़ा धोना और घर की साफ-सफाई तक करना मेरे ही जिम्मे था। घर का सारा काम मै ही करती थी ए क नौकरानी की तरह फिर भी मां मेरी शिकायत गांव के लोगों से करती रहती थी कि पूनम घर का कोई काम नहीं करती, सारा दिन सोती रहती है। मां के इस झूठ को सुनकर मै अवाक सी रह जाती। मेरा भाई भी इस बात पर मुझे ही भला बुरा कहता, कभी-कभी मार भी देता था। बबलू मुझसे छोटा था फिर भी मै उसके थप्पड़ या बात का कोई प्रत्युत्तर नही देती और अपनी किस्मत की बात सोचकर चुप रह जाती। भाई-बहनों और मां के इस व्यवहार को देख-सुनकर सोचती थी कि शादी के बाद मेरे किस्मत के दरवाजे खुलेंगे। तब शायद मै सुख-चैन से जी सकूंगी। लेकिन यह मेरा बहम था। मैने तो केवल सपनों में ही जीना सीखा था। हकीकत के रास्ते तो कांटों से भरे थे। मैं ए क नरक से निकलकर दूसरे नरक में धकेली जा रही थी पर ए क लड़की होने के कारण सब कुछ सहने को मजबूर थी। आश्चर्य भी हुआ कि जिस मां ने मेरे साथ इस तरह का व्यवहार किया उसका साथ मेरा भाई भी दे रहा है। बबलू ने तो दुनिया देखी है, फिर क्यों मेरी मां के इरादे को पूरा होने दे रहा है? इसलिए कि इस शादी से उसे कुछ पैसे बच जायेंगे। क्या मैंने उसकी कलाई में इसी दिन के लिए राखियां बांधती रही थी कि वहीं हाथ मुझे कसाई के खूंटे से बांध दें। तभी किसी ने मुझे झकझोरा। मैं जैसे सोते से जागी, पलटकर देखा तो दांत निपोरे तारकेश्वर खड़ा था। उसने शराब पी रखी थी। ए ेसे क्या देख रही है। जा कुछ खाने को ला। मैं चुपचाप खाना लाने रसोई में चली गयी।
Saturday, February 6, 2010
सात सौ की साइकिल मेंटीनेंस साढ़े आठ लाख
कौन कहता है कि साइकिल गरीबों की सवारी है। राजधानी में एक साइकिल ऐसी भी है, जिसके रखरखाव पर साल में साढ़े आठ लाख से अधिक रूपये खर्च किए जाते हैं। मजे की बात यह है कि यह मोटी रकम उस साइकिल पर खर्च की गयी है, जिसकी मूल कीमत करीब 700 रूपये थी और अब उसकी मौजूदा कीमत लगभग साढ़े तीन हजार आंकी गयी है। मामला ललित कला आकदमी का है, जिसने इतनी बड़ी रकम वर्ष 2009 में खर्च की है। इसका खुलासा अकादमी के विभागीय ऑडिट में हुआ है। इतनी बड़ी राशि एक साइकिल के रखरखाव पर खर्च किये जाने का मुद्दा पिछले वर्ष दिसम्बर (एक दिसम्बर 2009) में ही कौंसिल मेम्बरों की बैठक में भी उठ चुका है। एक साइकिल के रखरखाव पर बेतहाशा पैसा खर्च किये जाने का यह मामला कोई नया नहीं है। वर्ष 2009 में जहां अकादमी ने इस साइकिल के रखखराव पर 858,669 रूपये खर्च किये तो वर्ष 2008 में भी उसने इसी एक साइकिल के रखरखाव पर 453,578 रूपये खर्च कर दिये। आश्चर्य की बात तो यह है कि यह साइकिल है भी या नहीं, इसके बारे में अकादमी के किसी अधिकारी को कुछ भी पता नहीं है। सूत्रों के अनुसार जब इस साइकिल को खरीदा गया था तो उस वक्त इसकी कीमत लगभग 700 रूपये थी और अब अकादमी ने उसकी कीमत 3440 रूपये लगायी है। ऑडिट रिपोर्ट में 858669 रूपये की राशि व्हीकल मेन्टेंनेस के नाम पर दर्ज की गयी है। वहीं दूसरी और अकादमी के पास जो अचल संपत्ति के रूप में रिपोर्ट पेश की गई है, उसमें व्हीकल के नाम पर सिर्फ साइकिल का ही उल्लेख है। सूत्रों के अनुसार अकादमी के पास दो गाड़ियां थी जो वर्ष 2005 में बिक चुकी हैं और उसके बाद से अकादमी ने कोई भी गाड़ी नहीं खरीदी है। सूत्रों के अनुसार एक साइकिल जरूर हुआ करती थी लेकिन अब वह कहां है किसी को पता नहीं है, लेकिन व्हीकल मेंटेंनेस के नाम पर इतनी रकम कैसे खर्च हो रही है किसी को पता नहीं है। ऑडिट रिपोर्ट पर चार्टर्ड एकाउंटेंट कंपनी के प्रोपराइटर के अलावा ललित कला अकादमी के एकाउंट आफिसर, डिप्टी सेक्रेटरी (एडमिस्ट्रेशन) व अकादमी के सचिव के हस्ताक्षर हैं। एक दिसम्बर को हुई बैठक में कौंसिल के सदस्यों ने जब साइकिल के रखरखाव पर इतनी बड़ी राशि खर्च किये जाने को लेकर सवाल पूछे थे तो सचिव ने इसे टाइपिंग मिस्टेक बताया, लेकिन जब उससे पहले (वर्ष 2008) में साढ़े चार लाख से अधिक की राशि इसी मद में खर्च किये जाने के बारे में कौंसिल सदस्यों ने जानना चाहा तो सचिव जबाव नहीं दे सके थे। टैक्स के रूप में मिलने वाले आदमी के पैसे को इस तरह से पानी की तरह बहाने के बारे में जब ललित कला अकादमी के सचिव सुधाकर शर्मा से जानने की कोशिश की गयी तो पहले वे धमकाते हुए मोबाइल नम्बर कैसे मिला यह जानने की कोशिश करते रहे, बाद में कहा कि सरकारी अधिकारी से बात करने के लिए पहले से समय लो फिर बात करो। पूछे जाने पर कि कब बात करें तो उन्होंने कहा कि सप्ताह भर पहले समय लें, उसके बाद बात करने के बारे में बताएंगे।
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Wednesday, January 27, 2010
पाठकों की कमी के अंदेशे से प्रकाशक परेशान
महीने के आखिरी में शुरू होने वाले विश्व पुस्तक मेले को लेकर अभी से विरोध के स्वर मुखर होने लगे हैं। इस विरोध की वजह मेला आयोजकों द्वारा बुक स्टालों के किराये में बढ़ोतरी किये जाने के साथ-साथ मेले में ंआने वाले दर्शकों पर 20 रूपये का टिकट लगाया जाना है। प्रकाशकों का आरोप है कि पुस्तक मेले के आयोजन के पीछे सरकार की मंशा आम आदमी में पढ़ने की प्रवृति पैदा करना है। जबकि आयोजकों की मंशा सरकार के उद्देश्यों को दरकिनार कर इसे एक भव्य कारपोरेट मेले का शक्ल देना है। तीस जनवरी से राजधानी के प्रगति मैदान में शुरू होने जा रहे 19वें विश्व पुस्तक मेला में शामिल होने के लिए भारतीय प्रकाशकों को पिछले मेले की तुलना में चार हजार और 17वें विश्व पुस्तक मेले की तुलना में लगभग 9000 रूपये (नौ हजार) ज्यादा किराया देना पड़ रहा है। पिछले पुस्तक मेले में टिकट शुल्क 10 रूपये था और उससे पहले मेला प्रवेश निशुल्क होता था। डायमंड पाकेट बुक्स के चेयरमैन नरेन्द्र कुमार वर्मा ने कहा कि जब मेला आयोजक एनबीटी हमसे अधिक रूपये ले रहा है तो फिर दर्शकों पर 20 रूपये का टिकट क्यूं लगाया जा रहा है। सामयिक प्रकाशन के प्रमुख महेश भारद्वाज ने कहा कि सरकार का मकसद पुस्तक मेले के आयोजन के माध्यम से लोगों में पढ़ने की प्रवृति को जगाना है। लेकिन आयोजकों ने टिकट लगा कर मेला शुरू होने से पहले ही इसे फ्लाप कर दिया है। आयोजकों के इस कदम से यहां लाखों खर्च कर स्टाल लगाने वाले प्रकाशकों को घाटा उठाने के साथ-साथ पाठकों की कमी से भी जूझना होगा। प्रकाशकों ने कहा कि भारतीय प्रकाशन उघोग पहले ही पाठकों की कमी से जूझ रहा है। ऐसे में जब मेले में आने के लिए उनसे किराया लिया जाने लगेगा तो वह हमारी आ॓र देखना भी छोड़ देंगे। सरकार की मंशा हमेशा इस मेले के माध्यम से एक बड़ा पाठक वर्ग तैयार करने की रही है लेकिन आयोजक प्रगति मैदान में लगने वाले कॉरपोरेट मेलों से इस कदर प्रभावित है कि वह पुस्तक मेले को भी कॉरपोरेट मेला बनाने पर तुले हुए हैं। महेश भारद्वाज ने कहा कि इंदिरा गांधी के समय में हिन्दी प्रकशाकों को इतना सम्मान मिला हुआ था कि उन्हें हॉल नम्बर 6 में स्टाल लगाने की जगह दी जाती थी। इस हॉल को ‘हॉल आफ नेशन’ नाम दिया गया था। लेकिन धीरे-धीरे हिन्दी प्रकाशकों को एक कोने में फेंक दिया गया। हिन्दी के कई ऐसे प्रकाशक भी हैं जो इस बार स्टाल का किराया बढ़ाये जाने की वजह से मेले में शामिल नहीं हो रहा है।
Tuesday, January 26, 2010
लोगों में दिखा समारोह देखने का जुजून
गणतंत्र दिवस समारोह को देखने की ललक आम लोगों में किस कदर है, इसका नजारा मंगलवार को देखने को मिला। पूरा शहर घने कोहरे की गिरफ्त में था, सुरक्षाकर्मियों ने बैरिकेड्स लगाकर तमाम रास्तों को रोक दिया था, लेकिन इन सबके बावजूद लोग एक-दो नहीं, बल्कि 7-8 किलोमीटर की दूरी पैदल तय कर राजपथ समारोह देखने पहुंचे। पैदल पहुंचने वाले लोगों में ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा थी, जो दफ्तरों में निचले स्तर का काम करते हैं। इन्होंने अपने अधिकारियों से गणतंत्र दिवस समारोह के पास हासिल किये थे। राधेश्याम अपने परिवार के साथ गीता कॉलोनी से पैदल ही राजपथ पहुंचे। वह इस बात से नाराज दिखे कि बड़े साहब और अधिकारियों को गाड़ियां पुलिसवाले ले जाने दे रहे हैं, लेकिन आटो और बसों को नहीं जाने दे रहे हैं। हम लोग साहब से ‘पास’ तो मांग लेते हैं, लेकिन गाड़ी नहीं होने के कारण पैदल आना पड़ा है। गाड़ी का भी पास है, लेकिन पुलिस कहती है यह कार, स्कूटर व मोटरसाइकिल के लिए है। आटो पर नहीं चलेगा। राधेश्याम की तरह, सुबोध भी अपने बुजुर्ग मां-बाप के साथ मंडावली से पैदल ही आए।
राष्ट्रीय पर्व पर गर्व से दिल गदगद
‘सुन मेरे बंधु रे, सुन मेरे मितवा, सुन मेरे साथी रे ...’ सन् 1959 में विमल राय द्वारा निर्देशित और एसडी बर्मन द्वारा गाया और संगीतबद्ध किया हुआ यह गीत जब राजपथ की फिजाओं में बिखरा, तो ऐसा लगा जैसे राजपथ से गीत और संगीत की अविरल धारा बह निकली हो। शास्त्रीय संगीत पर आधारित इस गीत के जरिये जिस तरह से त्रिपुरा ने अपने प्रांत में जन्मे संगीतकार व गायक स्व. सचिन देव बर्मन को सम्मान दिया, वह काबिलेतारीफ है। अब तक राजपथ पर राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाली झांकियों में उस राज्य की कला-संस्कृति, तीज-त्योहार व उसकी किसी उपलब्धि को ही दिखाया जाता रहा है, लेकिन त्रिपुरा ने मंगलवार को अपनी झांकी के जरिए एक अलग परंपरा की शुरूआत कर दी। कला को मिला यह एक ऐसा सम्मान है, जिसके आगे हर सम्मान छोटा पड़ जाएगा। एक अक्टूबर 1906 में त्रिपुरा के एक शाही परिवार में जन्मे सचिन दा ने 89 हिन्दी और 31 बांग्ला फिल्मों में संगीत दिया है। उन्हें ‘नाविक गीतों’ (जिसे बंगाली में भटियाली कहा जाता है) को गाने और उनका संगीत तैयार करने में महारत हासिल थी। यही वजह है कि इस तरह के गीतों को सबसे ज्यादा संगीतबद्ध उन्होंने ही किया है। ‘अराधना’ का गीत ‘मेरे सपनों की रानी कब आयेगी तू, आयी रूत मस्तानी कब आयेगी तू, बीती जाए जिन्दगानी कब आयेगी तू, चली आ तू चली आ... और ‘एक घर बनाऊंगा, दुनिया बसाऊंगा तेरे घर के सामने..., जैसे कुछ एक ऐसे गीत हैं, जिनकी धुनें युवाओं को आज भी रोमांचित करती हैं। ऐसे एवरग्रीन संगीतकार और गायक को राजपथ पर त्रिपुरा की आ॓र से मिले सम्मान ने निस्संदेह फिल्म इंडस्ट्री को गरिमा का अहसास कराया है। हो सकता है भविष्य में राजपथ पर ऐसी और झांकियां देखने को मिले।
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