Saturday, July 3, 2010

एमटीएनएल लैडलाइन नेटवर्क पर होंगी फ्री बातें


महंगाई की मार से हलकान दिल्लीवासियों को एमटीएनएल के लडलाइन फोन से 60 रुपए के अतिरिक्त शुल्क में एमटीएनएल से एमटीएनएल बेसिक व मोबाइल पर अनलिमिटेड बात करने की सौगात देगा। सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो उपभोक्ताओं को यह सुविधा इसी माह से मिलने लगेगी। प्रयोग के तौर पर अभी यह योजना कश्मीरी गेट स्थित आटो पार्ट्स दुकानदारों के बीच चल रही है। एमटीएनएल द्वारा इस सुधिवा के शुरू होने से राजधानी में स्थित उसके 15 लाख लडलाइन उपभोक्ता को फायदा होगा। इस सुविधा को शुरू किए जाने की पुष्टि एमटीएनएल के ईडी मनजीत सिंह ने दी है। उन्होंने कहा कि आज के दौर में लोग लैंडलाइन से बहुत कम फोन कर रहे हैं। ऐसे में लोगों को अब घर में रखा फोन बेकार लग रहा है। इसलिए हम अब ऐसे फोन धारकों को फोन का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने के लिए महज 60 रुपए अतिरिक्त में दिल्लीभर में स्थित अपने लडलाइन व मोबाइल फोन पर असिमित बात करने की सुविधा देने की योजना बना रहे हैं। इस सुविधा के शुरू होने से न केवल लोग लडलाइन का इस्तेमाल ज्यादा करेंगे बल्कि वह अन्य नेटर्वकों पर भी लडलाइन से बात करेंगे। ऐसे में फायदा हमें ही होगा। उन्होंने कहा कि इस सेवा को बहुत जल्द शुरू किया जाएगा। राजधानी में एमटीएनएल के कुल उपभोक्ताओं की संख्या 23 लाख के आसपास है.

अमूल दूध कल से महंगा


राजधानी में रविवार (4/7/10) से अमूल गोल्ड (फुल क्रीम) दूध दो रुपये प्रतिलीटर महंगा हो जाएगा। दूध की कीमतों में यह बढ़ोतरी पिछले छह महीने में दूसरी बार हुई है। इससे पहले अमूल ने इस साल फरवरी में दूध की कीमतों में एक से दो रुपये तक की बढ़ोतरी की थी। अमूल ने फिलहाल यह बढ़ोतरी सिर्फ फुलक्रीम दूध में की है, लेकिन माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में टोंड दूध की कीमतों में भी बढ़ोतरी हो सकती है। बढ़ोतरी के बाद रविवार से अमूल गोल्ड दूध 32 रुपये प्रति लीटर हो जाएगा। रविवार से दिल्लीवासियों को अपने बच्चों को दूध पिलाने के लिए भी सोचना पड़ेगा। अभी पिछले सप्ताह ही पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों में हुई बढ़ोतरी ने लोगों का बजट बिगाड़ कर रख दिया है। अब रही सही कसर दूध की कीमतों में हुई बढ़ोतरी ने पूरी कर दी है। अमूल ने शुक्रवार को रविवार से अपने गोल्ड ब्रांड दूध की कीमतों में प्रतिलीटर दो रुपये बढ़ोतरी किए जाने की घोषणा की। राजधानी में अमूल दूध की खपत लगभग 10 लाख लीटर प्रतिदिन है। जबकि पहले स्थान पर मदर डेयरी और दूसरे स्थान डीएमएस का दूध है। अमूल द्वारा दूध की कीमतों में बढ़ोतरी के बाद माना जा रहा है कि अगले दो एक दिनों में मदर डेयरी और डीएमएस भी अपने दूध की कीमतों में इजाफा किए जाने की घोषणा कर सकते हैं, क्योंकि अब तक अमूल दूध की कीमतों में बढ़ोतरी के बाद ही यह दोनों दूध आपूर्तिकर्ता अपनी कीमतें बढ़ाते रहे है।

Friday, June 25, 2010

कॉमनवेल्थ गेम्स : बनने थे 60 ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन, बने सिर्फ 13

कॉमनवेल्थ गेम्स तक मौसम विभाग को राजधानी के मौसम पर रखने के लिए गेम्स से पहले 60 ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन (ए डब्ल्यूए स) स्थापित करने थे लेकिन फंड की कमी के कारण अभी तक केवल 13 डब्ल्यूए स ही स्थापित किए गए हैं। जबकि गेम्स में महज सौ दिन दिन बचे हैं, और इतने कम समय में किसी भी हालत में 47 ए डब्ल्यूए स स्थापित नहीं किया जा सकता है। ए ेसे में अगर खेल के दौरान मौसम ‘विलेन’ बन जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। गेम्स के दौरार मौसम की वजह से खेल में कोई खलल न पड़े इसके लिए मौसम विभाग ने राजधानी व ए नसीआर में 60 आटोमेटिक वेदर स्टेशन (ए डब्ल्यूए स) स्थापित किये जाना था, लेकिन फंड की कमी की वजह से इसमें से अभी तक सिर्फ 13 ए डब्ल्यूए स ही स्थापित किये जा सके हैं। मौसम विभाग ने कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान मौसम की सटिक और पल-पल की जानकारी देने के लिए सालभर पहले दिल्ली और आसपास के इलाके में कुछ 60 ए डब्ल्यूए स स्थापित किये जाने की योजना तैयार की थी। इसके लिए उसने तैयारी भी शुरू कर दी थी। लेकिन उसकी रफ्तार का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि खेल होने में महज सौ दिन बचे है आंैर उसने अभी तक 60 में से केवल 13 ए डब्ल्यूए स ही दिल्ली और ए नसीआर में स्थापित किये है। इतने कम ए डब्ल्यूए स के सहारे वह मौसम की सटिक जानकारी गेम्स आयोजन समिति और विदेशी मेहमानों को कैसे मुहैया करा पायेगी यह न तो मौसम वैज्ञानिकों को समझ में आ रहा है और न ही विभाग के अधिकारियों को ही। मौसम विभाग के डायरेक्टर जेनरल वीपी वर्मा के अनुसार योजना तो 60 ए डब्ल्यूए स लगाने की थी और हमने अभी तक 13 ए डब्ल्यूए स लगाये है। जिनमें से 10 दिल्ली में और 2 ए नसीआर में लगाये गए है। ए क पहले से लगा हुआ है। इसके अलावा मौसम की हर गतिविधि पर नजर रखने के लिख पालम में ए क ए स बैंड का रडार लगाया गया है। इसके अलावा पश्चिमी विक्षोभ पर नजर रखने के लिए जयपुर में सी बैंठ का ए क रडार लगाया जायेगा। इस रडार से राजस्थान की आ॓र से आने वाली हवाओं पर नजर रखी जाए गी। क्योंकि उस आ॓र से होकर आने वाली हवाए दिल्ली की फिजा को सबसे ज्यादा प्रभावित करती है। मौसम विभाग के वैज्ञानिकों के अनुसार राजधानी अलग-अलग इलाके का तापमान अलग-अलग होता है। कई बार तो राजधानी के कुछ ए क इलाके में झमाझम बारिश हो जाती है और मौसम विभाग को इसकी भनक तक नही होती है। इसकी वजह यह होती है कि उस इलाके में मौसम विभाग का मौसम मापक यंत्र नहीं होता है या है भी तो मैन्यूल होने की वजह से वहां की जानकारी तुरंत मुख्यालय तक नहीं पहुंच पाती है। अगर यहीं स्थिति कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान बनती है तो यकीनन फजीहत होनी तय है।

कॉमनवेल्थ गेम्स 100 दिन शेष कब शुरू होगी सांस्कृतिक कार्यक्रमों की रिहर्सल

कॉमनवेल्थ गेम्स शुरू होने में महज सौ दिन बचे हैं और कई ए ेसे कार्यक्रम हैं, जिनकी शुरूआत तक अभी नही हुई है। इन कार्यक्रमों में उस दौरान राजधानी में आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम भी शामिल हैं। इनमें लोक नृत्य-संगीत के अलावा भारतीय शास्त्रीय नृत्य-संगीत, थिए टर, फाइन आटर्स व क्राफ्ट् आदि से लेकर फिल्म शो तक के कार्यक्रम आयोजित होने हैं। इनमें सबसे ज्यादा रिहर्सल वैसे कार्यक्रमों को चाहिए , जिनमें कलाकारों का ग्रुप शामिल है। जानकारी के अनुसार गेम्स के दौरान राजधानी पहुंचने वाले विदेशी मेहमानों को भारतीय कला-संस्कृति से रूबरू कराने के लिए दर्जन भर सांस्कृतिक कार्यक्रम किये जाने हैं। इनका आयोजन दिल्ली सरकार विभिन्न अकादमियों के सहयोग से करेगी, जिनमें हिन्दी, पंजाबी, उर्दू, मैथिली भोजपुरी, सिंधी अकादमियों के अलावा साहित्य कला परिषद आदि शामिल हैं। सूत्रों के अनुसार गेम्स के दौरान आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की रूपरेखा कागजों में तो तैयार हो चुकी है लेकिन हकीकत से अभी यह कोसों दूर है। गेम्स के दौरान अंग्रेजों से लेकर देश के आजाद होने तक की कहानी को बयां करने वाले नाटक का रिहर्सल तक अभी शुरू नहीं हुई है, जबकि इस तरह के नाटकों को तैयार करने में तीन महीने से भी अधिक का वक्त लगता है। अब तक यह भी तय नहीं हुआ है कि राजधानी के किस हिस्से में कौन सा कार्यक्रम और किस दिन आयोजित किया जाए गा। कार्यक्रमों के आयोजन की जिम्मेदारी निभाने वाली लभगभ सभी अकादमियों के प्रमुखों की ए क ही जबाव है कि अभी वह कुछ भी बताने की स्थिति में नहीं है। यही स्थिति सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन से जुड़े अन्य अधिकारियों की भी है। वही दूसरी आ॓र सूत्र बताते है कि कुछ ए क अकादमियों ने तो अभी तक उन कलाकारों का चयन तक नहीं किया है जिन्हें गेम्स के दौरान कार्यक्रम पेश करना है। कला और संस्कृति से जुड़े कुछ वरिष्ठ कलाकारों का कहना है कि अगर सरकार विदेशी मेहमानों के सामने भारतीय कला और संस्कृति को सही तरीके और प्रभावशाली ढ़ंग से पेश करना चाहती है तो उसे इसकी तैयारी (रिहर्सल) अभी से शुरू कर देनी चाहिए । क्योंकि कई कार्यक्रम ए ेसे होते हैं जिनमें दो तीन से ज्यादा कलाकार होते है। ए ेसे कार्यक्रमों की सफलता ज्यादा से ज्यादा रिहर्सल पर ही टिकी होती है।

Thursday, May 27, 2010

कॉमनवेल्थ गेम्स में साहित्य का तड़का

नई दिल्ली। यदि भाषा वाध्यता के चलते आपने नाईजिरियाई सिमांडा अडिची की ‘द थिंग अराउंड योर नेक’, घाना की लेखिका आयशा हारूना अट्टा की ‘हरमैटन रेन’, सामोवा के लेखक अल्बर्ट वेंडि्ट की ‘द एडवेंचर ऑफ वेला’ के पढ़ने का आनंद नही ले पाए हैं तो अब परेशान होने की जरूरत नही है। आपकी इस समस्या का समाधान करने के लिए हिन्दी अकादमी सामने आयी है। अकादमी कॉमनवेल्थ देशों के साहित्यकारों व उनकी रचनाओं को हिन्दी में प्रकाशित करने की तैयारियों में जुट गयी है। इस योजना के पीछे अकादमी का उद्देश्य सभी सदस्य देशों को साहित्यिक रूप से एक दूसरे के निकट लाना है। कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान हिन्दी अकादमी अपनी त्रैमासिक पत्रिका ‘इंद्रप्रस्थ भारती’ का एक विशेष अंक प्रकाशित करने वाली है। इस विशेष अंक में कॉमनवेल्थ देशों के लोकप्रिय (मैग्सेसे, बुकर, नोवेल व उन देशों के राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित) लेखकों की कृतियों व उनके साक्षात्कार हिन्दी में प्रकाशित किए जाएंगे। इसके अलावा भारतीय साहित्य व साहित्यकारों से विशेष जुड़ाव रखने व अपनी भाषा में इन्हें बढ़ावा देने वाले विदेशी रचनाकारों को भी इस अंक में शामिल किया जाएगा। अकादमी के सचिव रवीन्द्र नाथ श्रीवास्तव ने बताया कि कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान प्रकाशित होने वाले इस विशेष अंक में उन विदेशी साहित्यकारों को भी शामिल किया जाएगा जिन्होंने साहित्य के विकास में सैद्धांतिक योगदान दिया है। इसके अलावा उन साहित्यकारों को भी शामिल किया जाएगा जिन्होंने किसी सांस्कृतिक सिद्धांत का प्रतिपादन किया हो या इसमें सहयोग दिया हो। रवीन्द्र नाथ श्रीवास्तव ने कहा कि उन देशों में जहां भारतीय भाषाएं बोलचाल में तो प्रयोग की जाती है लेकिन लिपी के रूप में किसी अन्य भाषा का प्रयोग किया जाता है, उन्हें भी वास्तविक पहचान दिलाने की पहल इस पत्रिका के माध्मय से की जाएगी। पत्रिका का उद्देश्य ऐसे साहित्यकारों को ढूंढकर भारतीय भाषाओं में साहित्य रचने के लिए प्रोत्साहित करना है। उन्होंने कहा कि नोवेल पुरस्कार विजेता वीएस नायपाल के साक्षात्कार के साथ-साथ उनके जैसे अन्य साहित्यकारों को इस विशेष अंक में विशेष स्थान दिया जाएगा। इसके लिए विदेशी भाषाओं के विशेषज्ञों की टीम बनायी गयी है।

Wednesday, April 7, 2010

57 फीसद ब्याज वसूलने की जानकारी रिजर्व बैंक को नहीं

आम आदमी को साहूकारों के चंगुल से बचाने के लिए सरकार बैंकों से लोन लेने की बात करती है लेकिन उसे यह नहीं मालूम कि निजी बैंक साहूकारों से दो कदम आगे निकल चुके हैं। निजी बैंक दिए गए लोन पर सलाना 58 फीसद तक ब्याज वसूल रहे हैं। इसकी जानकारी न तो रिजर्व बैंक को है और न ही प्रधानमंत्री कार्यालय और वित्त मंत्रालय को। इस बात का खुलासा एक आरटीआई में हुआ है। कन्हैया लाल नामक शख्स ने आईसीआईसीआई से 2006 में 35 हजार 900 रूपए का लोन लिया था, जिस पर बैंक ने 48.1 फीसद की दर से ब्याज वसूला। इसके बाद उन्होंने इंडिया बुल्स बैंक से 18 हजार का लोन लिया, जिस पर बैंक ने 57.22 फीसद ब्याज मांगा, जिसे उन्होंने देने से मना कर दिया। इस मामले में उन्होंने आरटीआई दायर कर रिजर्व बैंक से यह जानकारी मांगी कि कोई बैंक कितना ब्याज वसूल सकता है। कन्हैया लाल ने दिसम्बर 2007 को आरटीआई दायर कर प्रधानमंत्री कार्यालय से भी यही जानकारी मांगी। पीएमआ॓ ने श्रीलाल को जानकारी मुहैया कराने के लिए आरबीआई को पत्र लिखा। आरबीआई ने पत्र संख्या आरआई 5736/07.05.01/2007-08 (दिनांक 04/02/08) के माध्यम से कहा की पर्सनल लोन पर आईसीआईसीआई बैंक द्वारा वसूले जा रहे ब्याज के बारे में उसके पास कोई जानकारी नहीं है। कन्हैया लाल ने आरबीआई से यह भी जानना चाहा है कि जब उसने 16 नवम्बर 2006 के अपने पत्र में कहा कि ग्राहकों के शोषण के मामले प्राइवेट बैंक आगे हैं, यदि यह सही है तो फिर आईसीआईसीआई बैंक के सीईआ॓ केवी कामत को पद्मश्री पुरस्कार देने का निर्णय किसने लिया? उन्होंने यह भी जानना चाहा कि आईसीआईसीआई और इंडिया बुल्स बैंक सरकार को कितना आयकर चुकाते हैं। इन दोनों सवालों के जवाब में भी आरबीआई ने चुप्पी साध ली। कन्हैया लाल ने मनमानी ब्याज वसूलने के बारे में प्रधानमंत्री कार्यालय में भी आरटीआई दायर कर जबाव मांगा, जिसे प्रधानंमत्री कार्यालय ने पत्र संख्या आरटीआई/925/2007-पीएमए के माध्यम से भारत सरकार के वित्त सेवा विभाग को प्रेषित कर दिया। कन्हैया लाल ने इन दोनों बैंकों द्वारा उपभोक्ताओं से बेतहाशा ब्याज वसूले जाने की शिकायत राष्ट्रपति के अलावा उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सोनिया गांधी, राहुल गांधी, वित्त मंत्रालय, रिजर्व बैंक, बैंकिंग लोकपाल समेत लगभग तीन दर्जन से अधिक विभागों और अधिकारियों को पत्र लिख चुके हैं लेकिन पिछले लगभग चार वर्षो में उन्हें कहीं से संतोषजनक जवाब नहीं मिला है। कन्हैया लाल ने हार नहीं मानी है और पूरे मामले को कोर्ट में ले जाने का मन बनाया है।

Tuesday, March 23, 2010

लड़की होने का दर्द


अपनी इच्छाओं और सपनों को ध्वस्त होते मैं देखती रही थी, मूक दर्शक की तरह। यौवन की दहलीज पर कदम रखते ही हरेक लड़कियों की तरह मेरे भी कुछ अरमान दिल में हिलोरे लेने लगे थे। मैने भी अपने जीवन साथी की ए क धुंधली से तस्वीर अपने मन-मंदिर में बिठायी थी। ए कांत में अक्सर उस सपने के राजकुमार के ख्यालों में खो जाती थी। और जब सपना टूटता तो सोचती काश यह सपने सच होते। पर सपने तो सपने होते हैं, वो तो आंख खोलते ही पानी की बूंद के बुलबुले की तरह खत्म हो जाते हैं। मेरी अधिकतर सखियों की शादी हो चुकी थी शेष चंदा और रूपा ही बची थी, उनकी भी शादी तय हो चुकी थी। सभी सखियों का ससुराल अच्छा मिला था और उनके सपने का राजकुमार हकीकत के राजकुमार से अधिक मिलता जुलता हुआ था। वहीं मेरे सारे सपने आज टूट गये हैं। ए क कांच के घर की तरह जो समय की आंधी को भी नहीं सह सका और धूल में मिल गया। अपनी शादी की बात सुनकर मै कितनी खुश हुई थी। लगा था जैसे मेरा सपना अब सच होने वाला है। पर यह खुशी कु़छ ही पलों की थी। लोगों के मुंह से अपने होने वाले जीवन साथी के बारे में इस तरह(?) की बातें सुनकर। सारे सपने ए क वर्फ के टुकड़े की तरह सच्चाई की गर्मी से पिघल गये और शेष रह गया जमीन पर कीचड़ ही कीचड़। लगा जैसे मैं अपने ही परिवार के ऊपर आज तक बोझ थी और मेरी मां उस बोझ को उतार फेंकना चाहती थी और आज शायद वह अपने इस बोझ को उतार फेंकने में कामयाब भी हो गयी थीं। उसके इस कार्य में अस्पष्ट रूप से मेरे प्रिय भाई बबलू का भी पूरा-पूरा सहयोग था। मैं अच्छी तरह जानती थी कि अगर मेरा भाई चाहेगा ता उस जगह मेरी शादी नहीं होगी, पर वह भी शायद मुझे मेरी मां की तरह अपने घर से निकाल फेंकना चाहता था कूड़े करकट की तरह। इसका जिम्मेदार मैं बबलू को नहीं मानती, क्योंकि जब जननी ही मुझे अपने घर में शरण देना नही चाहती तो वह तो भाई था। अब सोचतीं हूं तो आंखों से आंसू नहीं थमते। पापा जब जिन्दा थे तो मेरी ए क मांग को पूरा करने के लिए क्या से क्या नहीं कर देते थे। मुझे अब भी अच्छी तरह याद है, मै अक्सर रूठ जाया करती थी तब पापा अपनी गोद में उठाकर मुझे मनाते थे, और घर के सभी लोगों को डांटते थे की कोई मेरे बेटे को कुछ नहंी कहेगा। पापा मुझे पूना बेटा कहकर बुलाते थे। पूना इसलिए की मेरा जन्म पूना शहर में हुआ था। जब तक पापा जिन्दा थे तब तक कभी भी मुझे किसी भी तरह की तकलीफ न होने दी और न ही कभी ए क पल भी उदास होने दिया। मेरी हर अच्छी बुरी मांगों को पापा ने पूरा किया। मेरी मां शुरू से ही मुझसे कुछ उखड़ी-उखड़ी सी रहती थी। जैसे मैं उनकी बेटी ही नहीं हूं। मै मम्मी के इस नाराजगी का कारण जानने की बहुत कोशिश करती रही पर कभी सफल न हो सकी। पापा के रहते हुए यह मेरी पहली असफलता थी। जिसकों मै चाह कर भी नहीं जान पायी थी। पापा को गुजरे आज पूरे पांच वर्ष बीत चुके हैं। इन पांच वर्षाे में अपने पापा की लाडली पूनम (पूना) अपने ही भाई-बहनों और मां की आंख की किरकिरी बन गई है। मां की तरह ही मेरा भाई बबलू मुझे ए क बकरी की तरह शादी के बहाने दूल्हे रूपी कसाई के हाथों बेंच देना चाहता था। कभी-कभी इच्छा होती कि अपने भाई से कहूं कि क्या तुम मेरे राखी का यही बदला चुका रहे हो? पर शर्मे के मारे चुप रह जाती थी। तब लगता था कि ए क लड़की कितनी बेवस होती है। उसकी इच्छाए ं कोई मायने नहीं रखती। न ही पिता के घर में न ही पति के घर में। दोनो ही घरों में वह केवल ए क काम करने वाली नौकरानी के रूप में ही इस्तेमाल होती रहती है। मेरी सहेली रूना की शादी इस साल होने वाली है। उसके लिए कितने ही लड़कों को देखा गया पर रूना हर लड़के में कोई न कोई खामी निकाल कर उसे नापसंद कर देती थी। हम सखियां जब उससे इस तरह से हर लड़के को नापसंद करने का कारण पूछती थी तो वह कितना ढिठाई से कहती ती कि जीवन तो मुझे गुजारना है उस लड़के के साथ और अगर मेरे मनपसंद का लड़का नहीं होगा तो मै कैसे उसके साथ अपनी जिन्दगी गुजारूगीं? रूना की इस तरह की बातों पर उसे कितना भला-बुरा हम सभी सखियां कहती थी। मेरी तो शर्म के मारे बुरा हाल हो जाता। रूना के इस तरह की बातें करने पर गांव वाले भी उसे संदेह की नजरों से देखते थे। गांव की बूढ़ी औरतें तो यह भी कहती थी कि यह फला लड़के से फंसी है और इस तरह की न जाने कितनी ही बातें रूना के बारे में आये दिन सुनने को मिलती थी। लेकिन ए क दिन रूना की शादी ए क अच्छे पढ़े-लिखे लड़के के साथ हुई, जिसके साथ वह मजे से जीवन गुजार रही है। आज जब अपने साथ होते हुए इस अन्याय को देखती हूं तो सोचती हू कि क्यों नही मै भी रूना की तरह हुई। क्यों नहीं मैं भी बेशर्म हो गई। अगर उस समय मै रूना की तरह बेशर्म हो गयी होती तो आज इस तरह से घुट-घुट कर जीना तो नहीं पड़ता। मै बचपन से ही जिद्दी किस्म की लड़की थी और मेरी सारी जिद को पापा ने पूरा किया था। आज इस शादी के शुभ अवसर पर पापा की याद आती है। मन करता है कि उड़कर पापा के पास जली जाऊं और उनकी गोद में छुप कर पूछूं कि क्या पापा आपकी बेटी इस लड़के के साथ सुखी जीवन गुजार सकती है? क्या आपने मुझे इसी दिन के लिए इतना बडा किया था? क्यों नहीं आपने मुझे मेरे पैदा होते ही गला घोंट कर मार दिया। अगर उस समय मेरी जीवन लीला समाप्त कर दिये होते तो आज आपकी लाडली बेटी को यह दिन नहीं देखना पड़ता और मैं फूट-फूटकर रोने लगी थी। बहुत देर तक रोती रही न जाने कब तक। आंख खुली तो सुबह की रोशनी चारों तरफ फैल चुकी थी। रोशनी में आंख खोला नहीं जा रहा था, लगता था जैेसे यह आंखे अंधेरे को सहने की आदी हो गयी हैं। मेरे पैदा होने के बाद मेरे घर में बहुत मन्नतों के बाद बबलू का जन्म हुआ था। उसके जन्म पर पापा ने पैसे को पानी की तरह बहा दिया था। हम चार बहनों के बाद बबलू पैदा हुआ था। पापा ने गांव में अष्टजाम करवाया था। गांव में धूम मच गयी थी। दादी ने मेरी पीठ पर लड्डू फोड़ी थी। सभी का मानना था कि मेरे पैदा होने से ही बबलू का जन्म हुआ है। उस समय परिवार के लिए लक्की थी, जिसके कारण मेरी हर अच्छी-बुरी इच्छाओं को पापा और दादी पूरा किया करते थे। लेकिन मां मुझसे नाराज रहती थी। लगता था जैसे मैने उनकी उच्छाओं के विपरीत उनके घर में जन्म ले लिया हो। जबकि मेरी इसमें कोई गलती नहीं थी। पापा के मरने के बाद मै ए क दम से अनाथ सी हो गयी। दादी पहले ही स्वर्ग सिधार चुकी थी। मै मां की उपेक्षाओं और ए क उम्मीद के साथ जीती रही थी कि मेरा भाई बबलू बडा होगा तो वह मेरी भावनाओं और इच्छाओं को अहमियत देगा। वही बबलू आज मेरे जीवन का सौदा करके आया है। वैसे मैने महसूस किया है कि बबलू भी इस रिश्ते से बहुत खुश नहीं है। लगता है जैसे उसे भी मेरी खुशियों का आभास है, पर पैसा खर्च न करना पड़े इसलिए वह मेरा रिश्ता तय कर आया है। मां और मेरी बड़ी बहन आरती के पति कृष्णा जीजा जी इस रिश्ते से बहुत खुश थे। जीजाजी नहीं चाहते थे कि मै उनके ससुराल में रहूं। क्योंकि मैने कभी उनकी शारीरिक भूख को शांत नहीं किया था। वह जब भी हमारे घर आते तो मुझसे अधिक मेरे शरीर से खेलना चाहते थे और अपनी हवश की आग को मेरे शरीर से शांत करना चाहते थे। जीजाजी के इस काम में मां भी थोड़ा बहुत सहयोग करती थी। जब जीजा जी की इस हरकत की शिकायत मां से करती तो वह कहती कि वह तुम्हारे जीजा जी ही तो हैं उनका इस तरह करने का हक है। वह मजाक में ए ेसा वैसा कुछ कर भी देते हैं तो क्या अंतर पड़ता है। वह तुम्हारी बहने के पति है तुमसे उनका हंसी मजाक का रिश्ता है। ए ेसा तो चलता ही रहता है। मां की इन बातों को सुनकर मैं सन्न रह जाती। सोचती जब बाड़ ही खेत को खाने लगे तो औरों से क्या शिकायत करना। मै चुपचाप अपने कमरे में आकर रोने लगती, बहुत देर तक रोती रहती। सोचती अब मै अपने ही घर में बेगानी हूं। मेरी बातों को सुनने वाला कोई नहीं है। अपने साथ होते इस व्यवहार को सहती रही कभी ऊफ तक नही की। फिर भी मां मुझसे सीधे मुंह बात नहीं करती थी। हरदम गाली से ही बात शुरू करती थी। मुझसे दो बहनें सुमन और निशा छोटी थी पर कभी भी मां या बबलू उन दोनों से कुछ भी नही कहते थे। मै ही सारा काम करती थी। खाना बनाने से लेकर सभी का कपड़ा धोना और घर की साफ-सफाई तक करना मेरे ही जिम्मे था। घर का सारा काम मै ही करती थी ए क नौकरानी की तरह फिर भी मां मेरी शिकायत गांव के लोगों से करती रहती थी कि पूनम घर का कोई काम नहीं करती, सारा दिन सोती रहती है। मां के इस झूठ को सुनकर मै अवाक सी रह जाती। मेरा भाई भी इस बात पर मुझे ही भला बुरा कहता, कभी-कभी मार भी देता था। बबलू मुझसे छोटा था फिर भी मै उसके थप्पड़ या बात का कोई प्रत्युत्तर नही देती और अपनी किस्मत की बात सोचकर चुप रह जाती। भाई-बहनों और मां के इस व्यवहार को देख-सुनकर सोचती थी कि शादी के बाद मेरे किस्मत के दरवाजे खुलेंगे। तब शायद मै सुख-चैन से जी सकूंगी। लेकिन यह मेरा बहम था। मैने तो केवल सपनों में ही जीना सीखा था। हकीकत के रास्ते तो कांटों से भरे थे। मैं ए क नरक से निकलकर दूसरे नरक में धकेली जा रही थी पर ए क लड़की होने के कारण सब कुछ सहने को मजबूर थी। आश्चर्य भी हुआ कि जिस मां ने मेरे साथ इस तरह का व्यवहार किया उसका साथ मेरा भाई भी दे रहा है। बबलू ने तो दुनिया देखी है, फिर क्यों मेरी मां के इरादे को पूरा होने दे रहा है? इसलिए कि इस शादी से उसे कुछ पैसे बच जायेंगे। क्या मैंने उसकी कलाई में इसी दिन के लिए राखियां बांधती रही थी कि वहीं हाथ मुझे कसाई के खूंटे से बांध दें। तभी किसी ने मुझे झकझोरा। मैं जैसे सोते से जागी, पलटकर देखा तो दांत निपोरे तारकेश्वर खड़ा था। उसने शराब पी रखी थी। ए ेसे क्या देख रही है। जा कुछ खाने को ला। मैं चुपचाप खाना लाने रसोई में चली गयी।