Monday, April 22, 2013

इंसाफ न मिला तो बन जाऊंगी आतंकवादी
 नई दिल्ली। इंसाफ की मांग को लेकर पिछले सौ दिनों से जंतर-मंतर पर बैठी राष्ट्रीय स्तर की बालीबॉल खिलाड़ी ने रविवार को कहा कि अगर अब न्याय नहीं मिला तो वह आतंकवादी बन जाएगी, और इसकी जिम्मेदार सरकार होगी। उन्होंने कहा कि सरकार पीड़िता को न्याय दिलाने के बजाय आरोपी को संरक्षण देती है। कानूनी दावपेंच में मामले को लंबा खींचा जाता है। ऐसे में मेरे सामने आतंकवादी बनने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है। पंजाब की यह महिला प्रदेश स्तर की खिलाड़ी हर चुकी है। ह्यूमन राइट एक्टिविस्ट के तौर पर वह दूसरों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ती रही हैं। वह पैरामेडिकल छात्रा से गैंगरेप की घटना के बाद न्याय की आस लिए राजधानी के जंतर मंतर पहुंची थी और यहां पर 12 जनवरी से सात फरवरी तक भूख हड़ताल पर बैठी थी। तब हालत खराब होने के बाद भूख हड़ताल समाप्त कर दी, लेकिन अभी तक यही पर डटी हुई हैं। इन सौ दिनों में रात के अंधेरे में पुलिस के चेहरे और चरित्र को नजदीक से देखने वाली यह खिलाड़ी कहती है कि रात के सन्नाटे में पुलिसवालों की बातचीत को सुन कर दिल दहल जाता है। लगता है जैसे उनके अंदर मानवता जैसी कोई चीज ही नहीं बची है। पिछले दिनों पांच वर्पीय बच्ची के साथ हुए दुष्कर्म की घटना से वह काफी परेशान हैं। वह कहती हैं कि पैरामेडिकल छात्रा से गैंगरेप की घटना के बाद लगा था कि सरकार और पुलिस की सोच में बदलाव आयेगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं। अब महिलाओं को अपनी सुरक्षा के लिए खुद ही पहल करनी होगी। उन्होंने पंजाब कै डर के एक आईपीएस अधिकारी पर जबरन शारीरिक संबंध बनाने और मारपीट का आरोप लगाते हुए कहा कि इस घटना हो गुजरे चार वर्ष होने को आ रहे हैं पर अभी तक न्याय नही मिला है। राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री तक से गुहार लगा चुकी हूं। पिछले सप्ताह यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिलने गयी थी। लेकिन अभी तक कहीं से भी न्याय मिलता हुआ नहीं दिख रहा है। ऐसे में अब मैं इतनी ज्यादा मायूस हो चुकी हूं कि मेरे सामने एक ही रास्ता बचा है आतंकवादी  बनने का। उन्होंने कहा कि अगर सरकार और पुलिस का रवैया ऐसे ही रहा तो आने वाले समय में रेप की शिकार महिलाएं न्याय के लिए पुलिस और कानून के पास जाने के बजाए खुद ही बदूंक उठाने को मजबूर होंगी।
रेप की शिकार महिलाओं को न्याय पाने के लिए अब खुद उठानी होगी बंदूक न्याय की आस लिए सौ दिनों से जंतर-मंतर पर बैठी है पीड़िता

दुष्कर्मी को मानसिक रोगी कहना गलत : डॉक्टर
नई दिल्ली । पांच वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म करने वाले आरोपी को मानसिक रोगी बताए जाने को कुछ डॉक्टर गलत मान रहे हैं। उनके अनुसार इस तरह के वीभत्स कृत्य को अंजाम देने वाला व्यक्ति बीमार नहीं हो सकता। अगर कोई मानसिक रूप से बीमार होगा तो उसका असर उसके पूरे व्यक्तित्व पर देखने को मिलेगा। ऐसे व्यक्ति की पहचान आसान है, लेकिन पांच वर्षीय बच्ची के साथ जिस तरह से दुष्कर्म किया गया है, उसे कोई विकृत मानसिकता वाला व्यक्ति ही अंजाम दे सकता है। डॉक्टर्स ऐसे लोगों के लिए मेडिकल शब्द ‘पाराफिलियस’ का इस्तेमाल करते हैं। इसके साथ ही एक और शब्द ‘सेडिज्म’ का इस्तेमाल किया जाता है। इंडियन एसोसिएशन ऑफ प्राइवेट सायकायट्रिस्ट के पूर्व अध्यक्ष डा. अवधेश शर्मा ऐसे लोगों को मानसिक रोगी मानने को कतई तैयार नहीं हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों को मानसिक रोगी कहकर सजा में नरमी की मांग की जाती है। जबकि हकीकत यह है कि ऐसे कृत्य को अंजाम देने वाले मानसिक विकृति के शिकार होते हैं। हम लोग ऐसे लोगों को मेडिकल भाषा में पाराफिलियस कहते हैं। इस तरह के विकृत मानसिकता वाले लोग दूसरों की भावनाओं के प्रति असंवेदनहीन होते हैं। उन्हें दूसरों को दुख पहुंचाने में मजा आता है। ऐसे लोग इतने वीभत्स तरीके से सेक्सुअल रिलेशन बनाते हैं कि सामने वाले को ज्यादा से ज्यादा पीड़ा हो। ऐसे में जब शराब या अन्य कोई दूसरी चीज जैसे अश्लील फोटो, फिल्म या पुस्तक मिल जाए, तो उससे जो कुछ भी वह ग्रहण करते हैं, उससे भी ज्यादा वीभत्स तरीके से ये लोग शारीरिक संबंध बनाते है। शर्मा के अनुसार, ऐसे ही लोग मुख मैथुन जैसे कृत्य को अंजाम देते हैं। सफदरजंग अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सक प्रो. यतीश अग्रवाल भी ऐसे लोगों को मानसिक रूप से बीमार नहीं मानते हैं। वह कहते हैं कि मानसिक विकृति का इलाज है, लेकिन ऐसे लोगों की पहचान नहीं हो पाती, क्योंकि हाव भाव या चेहरे से विकृत मानसिकता का पता नहीं चलता। शर्मा ने ऐसे लोगों की पहचान के लिए कुछ संकेत बताए हैं, लेकिन उन पर पूरी तरह से भरोसा नहीं किया जा सकता। मानसिक रोगी नहीं, मानसिक विकृति वाले लोग करते हैं ऐसे कृत्य ऐसे लोगों पहचानना मुश्किलक्ष्/

विकृत मानसिकता वालों के लक्षण अपोजिट सेक्स वालों के साथ अकेले रहने की कोशिश करना, मौके तलाशना या फिर ऐसे हालात पैदा करना जिससे कि एकांत मिले बगैर किसी कारण के शरीर को ‘टच’
करना, कपड़े की तारीफ करते हुए शरीर को टच करने की कोशिश करना। अश्लील कमेंट करना। कोई बच्चा अगर किसी से कटा-कटा सहमा हुआ रहे, तो ऐसे लोगों से सतर्क हो जाना चाहिए। ऐसे लोग भी मानसिक विकृति वाले हो सकते हैं।

कैसे पैदा होते हैं विकृत मानसिकता वाले लोग यौन हिंसा के शिकार बच्चे भी बड़े होकर ऐसे कृत्य को अंजाम देते हैं। उन्हें लगता है कि वह ऐसा करके अपने साथ हुए कृत्य का बदला ले रहे हैं। दूसरों के द्वारा बार-बार यह कहते सुना जाना कि स्त्री तो सिर्फ सेक्स के लिए होती है। अश्लील फि ल्में देखना, अश्लील पुस्तकें पढ़ना या फिर दोस्तों से शारीरिक संबंध बनाए जाने के बारे में जानना। जिनके माता-पिता ज्यादा हिंसक होते हैं। जिनके घर का माहौल गाली-गलौज वाला होता है। बात-बात में लोग एक दूसरे से लड़ने-झगड़ने पर उतारू हो जाते हैं। जिन घरों में महिलाओं को इज्जत नहीं दी जाती।

जब खुद चाहेंगे तभी उपचार संभव ऐसे लोगों का इलाज तभी हो सकता है, जब वह खुद चाहेंगे। ऐसे लोग, जहां काम करते हैं, वहां भी लोगों को शर्मिदगी का शिकार होना पड़ता है। यह शर्मिदगी उस वक्त होती है, जब वह किसी महिला को टच करने की कोशिश करते हैं या एकांत में कमेंट करते हैं। जिन लोगों को अपोजिट सेक्स वाले के साथ एकांत में मिलने की उत्तेजना महसूस हो। उन्हें लगे कि वह सामने वाली महिला के साथ कुछ भी कर सकता है और वह कुछ नहीं कहेंगी, तो तुरंत उसे मनोरोग विशेषज्ञ के पास जाना चाहिए। ऐसे लोगों का इलाज दवा से नहीं हो सकता है। मनोरोग विशेषज्ञ उन्हें कुछ टिप्स बताते हैं, जिनमें अश्लील चीजों को न देखने, किसी महिला के साथ अकेले न रहने आदि की हिदायत दी जाती है।
     


Thursday, August 23, 2012

Tuesday, April 24, 2012

गंदगी से मुक्ति के लिए ट्रेनों में ग्रीन टॉयलेट


आने वाले दिनों में रेलवे स्टेशनों पर पहुंचने के बाद रेल लाइनों पर फैली मल-मूत्र की गंदगी और उससे उठने वाली बदबू की वजह से नाक बंद करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। रेलवे इस समस्या से निजात दिलाने के लिए ट्रेनों में ग्रीन टॉयलेट लगाएगा। पहले चरण में ढाई हजार ट्रेनों में ग्रीन टॉयलेट लगाए जाएंगे। ग्रीन टॉयलेट लगाए जाने के बाद रेलवे लाइनों व स्टेशनों पर मल-मूत्र की गंदगी फैलने से तो निजात मिलेगी ही, साथ ही स्टेशनों पर फैलने वाली गंदगी को साफ करने में खर्च होने वाले हजारों लीटर पानी की बर्बादी भी रुकेगी। उत्तर रेलवे के डीआरएम अनी लोहानी ने सोमवार को एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि ट्रेनों मे ग्रीन टॉयलेट की शुरुआत इस महीने से हो गई है और उत्तर रेलवे के एक ट्रेन के कुछ एक डिब्बों में इसे लगाया गया है। उन्होंने बताया कि अभी पहले चरण में इस साल कुल 2500 ग्रीन टॉयलेट ट्रेनों मे लगाए जाएंगे। इसके बाद तीन हजार और ग्रीन टॉयलेट लगाए जाने की योजना है। लोहानी ने बताया कि ट्रेनों में ग्रीन टॉयलेट लगाए जाने के बाद रेलवे स्टेशनों और रेलवे ट्रैकों पर फैलने वाली गंदगी से बहुत हद तक निजात मिल जाएगी। दिल्ली मंडल के सीनियर डीएमई जेकेंिसंह ने कहा कि ग्रीन टॉयलेट को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि महीने में एक बार ही इसकी जांच करने की जरूरत पड़ेगी। हर टॉयलेट में 150 लीटर लिक्विड वैक्टीरिया डाला गया है, जो मल को अवशोषित कर लेता है और मूत्र बाहर गिर जाता है। उन्होंने कहा कि एक बार ग्रीन टॉयलेट के बाक्स में डाला गया वैक्टीरिया दो वर्षो तक काम करता है। उन्होंने बताया कि एक ग्रीन टॉयलेट के निर्माण पर 90 हजार रुपये का खर्च आता है। इस वर्ष लगेंगे ढाई हजार ग्रीन टॉयलेट

Monday, April 23, 2012

छुट्टियों में हासिल करें हुनर, होगा व्यक्तित्व विकास


 नई दिल्ली। खेल-खेल में बच्चों के व्यक्तित्व विकास और उन्हें हुनरमंद बनाने का सिलसिला अगले महीने से शुरू हो जाएगा। अगले महीने से शुरू होने वाले समर वर्कशॉप में दाखिला दिलाने के लिए अभिभावकों ने दौड़ लगानी शुरू कर दी है। इस बार राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) ने राजधानी के नौ स्कूलों में समर वर्कशॉप चलाए जाने की घोषणा की है, जबकि साहित्य कला परिषद ने 50 से अधिक जगहों पर अपना वर्कशॉप चलाए जाने की बात कही है। एनएसडी और साहित्य कला परिषद का वर्कशॉप मई महीने के तीसरे सप्ताह में शुरू होगा, जबकि बाल भवन ने पहले सप्ताह से ही वर्कशॉप शुरू किये जाने की बात कही है। समर वर्कशॉप के प्रति अभिभावकों की बढ़ती रुचि का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रतिवर्ष समर वर्कशॉप कराने के लिए भरे जाने वाले फार्मो की संख्या में 20 से 30 फीसद तक का इजाफा हो रहा है। लोगों की बढ़ती रुचि का फायदा उठाने के लिए सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के अलावा स्कूलों ने भी अपने-अपने स्तर पर ग्रीष्मकालीन कार्यशाला का आयोजन करना शुरू कर दिया है। इसके लिए स्कूल और प्राइवेट संस्थाएं अभिभावकों से मोटी रकम लेती हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) की ओर से इस वर्ष नौ सेंटरों पर कार्यशाला का आयोजन किया जाएगा। 18 मई से 17 जून तक चलने वाली इस कार्यशाला में एक सेंटर में कम से कम 90 और अधिक से अधिक 120 बच्चे होते हैं। इन्हें अलग-अलग ग्रुप में बांटकर तीन-तीन प्रशिक्षक अभिनय का प्रशिक्षण देते हैं। एनएसडी की ओर जिन स्कूलों में कार्यशाला का आयोजन किया जाएगा, उनमें महाराजा अग्रसेन पब्लिक स्कूल (अशोक विहार), हैप्पी मॉडल स्कूल (जनकपुरी), ग्रेट मिशन टीचर्स ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (सेक्टर-5, द्वारका), एनपी गल्र्स सेकेंड्री स्कूल (सुजान सिंह पार्क), एनपी को- एड मिडिल स्कूल (हेवलोक स्क्वेयर, आरएमएल अस्पताल के पास), एल्कान पब्लिक स्कूल (मयूर विहार फेज-1) और डीएवी पब्लिक स्कूल, श्रेष्ठ विहार शामिल हैं। इसी तरह, साहित्य कला परिषद की ओर से इस बार राजधानी के 50 से अधिक जगहों पर ग्रीष्मकालीन कार्यशाला का आयोजन किया जाएगा। इसकी शुरुआत मई के तीसरे सप्ताह से होगी। दिल्ली सरकार की ओर से आयोजित होने वाली इस कार्यशाला में हिस्सा लेने के लिए बच्चों को किसी भी तरह का कोई शुल्क नहीं चुकाना होगा। लेकिन एनएसडी की ओर से चलाई जाने वाली कार्यशाला के लिए प्रति छात्र 500 रुपये देने होंगे। फार्म के लिए अलग से 50 रुपये चुकाने होते हैं। साहित्य कला परिषद के सचिव शेखर वैष्णवी की मानें तो इस बार चारों जोन के 50 से अधिक पब्लिक और सरकारी स्कूलों में कार्यशाला आयोजित की जाएगी, जिसमें चार हजार से अधिक बच्चों को डेढ़ सौ से अधिक प्रशिक्षक ट्रेनिंग देंगे। राष्ट्रीय बाल भवन की ओर से छुट्टी होने के साथ ही स्कूलों में ग्रीष्मकालीन कार्यशाला शुरू कर दी जाएगी, जो जून के आखिर तक चलेगी। यहां बच्चों को प्रशिक्षण के लिए सबसे कम फीस देनी होती है। यहां 5 से 12 साल के बच्चों को एक साल के रजिस्ट्रेशन के लिए महज 50 रुपये व 13 से 16 साल के बच्चों को 100 रुपये देने होते हैं। रजिस्ट्रेशन कराने वाले बच्चे वषर्भर बाल भवन में होने वाले तमाम तरह के वर्कशाप में हिस्सा ले सकते हैं। बच्चों को राजधानी के तमाम इलाकों से भवन तक लाने के लिए बस की फैसिलिटी भी भवन की ओर से मुहैया कराई जाती है। इसके लिए बच्चों को दूरी के हिसाब से शुल्क चुकाना होता है। यहां बच्चे खेल- खेल में फोटोग्राफी, कम्प्यूटर, क्ले मॉडलिंग, वुडवर्क, वीडियोग्राफी, पेंटिंग्स, खेलकूद, संगीत, नृत्य, अभिनय आदि का प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते हैं। साहित्य कला परिषद को छोड़कर एनएसडी और बाल भवन में रजिस्ट्रेशन शुरू हो चुका है। इनके अलावा कई पब्लिक स्कूलों की ओर से निजी तौर पर ग्रीष्मकालीन प्रशिक्षण कार्यशाला आयोजित किए जाते हैं, लेकिन इसके लिए छात्रों से मोटी रकम वसूली जाती है।
कौन-कौन से संस्थान चलाते हैं ‘समर वर्कशॉप’
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय साहित्य कला परिषद श्रीराम सेंटर राष्ट्रीय बाल भवन राष्ट्रीय प्राकृतिक विज्ञान केंद्र इनके अलावा कई गैर सरकारी संस्थानों की ओर से भी समर वर्कशॉप का आयोजन किया जाता है। कितना लगेगा शुल्क 50 रुपये से लेकर 500 रुपये तक (सरकारी संस्थाओं में)। निजी संस्थाओं और स्कूलों की ओर से चलाए जाने वाले समर वर्कशॉप के लिए चुकाने होंगे 500 से 7500 रुपये तक। निजी संस्थाओं के समर वर्कशॉप की फीस एनिमेशन कोर्स के लिए 1000 से लेकर 3500 रुपए तक डांस के लिए 500 से 3000 रुपए तक म्यूजिक के लिए 750 से लेकर 3000 रुपए तक फुटबाल व स्केटिंग के लिए 350 से 1500 रुपए तक कम्प्यूटर कोर्स के लिए 750 से 4500 रुपए तक आर्ट एंड क्राफ्ट के लिए 250 से 1000 रुपए तक।

कब्जों के चलते रेलवे की कई योजनाएं अधर में

उत्तर रेलवे अतिक्रमण का शिकार हो गया है, जिस वजह से कब्जों के चलते रेलवे की कई योजनाएं अधर में लटी हुई हैं.

रेलवे की जमीन पर अतिक्रमण का आलम यह है कि लोगों के रेलवे की जमीन पर ट्रैक के निकट झुग्गी-झोंपड़ी बना लेने की वजह से एक दशक पूर्व रेल मंत्रालय द्वारा स्वीकृत परियोजनाएं अब तक शुरू नहीं हो पाई हैं. स्वीकृत इन परियोजना की मूल लागत में अब तीन सौ फीसद तक की बढ़ोतरी हो चुकी है.
रेल मंत्रालय ने वर्ष 1999-2000 में दया बस्ती के पास दोहरी लाइन ग्रेड सेपरेटर बनाए जाने की स्वीकृति प्रदान की थी. करीब 3.075 किलोमीटर लंबी इस ग्रेड सेपरेटर को बनाने पर उस वक्त 54.15 करोड़ की राशि खर्च होने का अनुमान था.
रेलवे सूत्रों के अनुसार 3.075 किलोमीटर लंबी ग्रेड सेपरेटर परियोजना के तहत चार पुल (एक आरयूबी, एक रेल ट्रैक फ्लाईओवर और दो नालों के ऊपर पुल) बनाए जाने थे. जिस जगह पर यह परियोजना शुरू होनी थी, उस जगह पर करीब दो हजार झुग्गीवासियों ने कब्जा किया हुआ है.
उत्तर रेलवे के दिल्ली मंडल के वरिष्ठ जनसंपर्क अधिकारी वाईएस राजपूत के अनुसार झुग्गी-झोंपड़ी वालों के पुनर्वास के लिए वर्ष 2004-05 में रेलवे ने दिल्ली सरकार के स्लम बोर्ड को 11.25 करोड़ रुपये का भुगतान किया था.
उन्होंने कहा कि जिस समय झुग्गीवासियों के पुनर्वास के लिय रेलवे ने संबंधित विभाग को राशि का भुगतान किया था, उस समय इतनी राशि में  झुग्गीवासियों का पुनर्वास हो गया होता, लेकिन अभी तक झुग्गीवालों ने रेलवे की जमीन पर कब्जा जमाया हुआ है.
अतिक्रमण हटाने में हो रही देरी की वजह से परियोजना की राशि बढ़कर 150 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है. परियोजना शुरू होने में अगर और देरी होती है, तो लागत राशि में और इजाफा हो जाएगा.
उन्होंने बताया कि अतिक्रमण हटाने के लिए रेलवे के अधिकारी दिल्ली सरकार समेत संबंधित विभाग से लगातार संपर्क में हैं. लेकिन अभी तक कोई विशेष प्रगति नहीं हुई है. राजपूत के मुताबिक, केवल ग्रेड सेपरेटर परियोजना ही अधर में नहीं लटकी हुई है, बल्कि इसकी वजह से तुगलकाबाद से पलवल के बीच प्रस्तावित चौथी रेल लाइन परियोजना भी अधर में है. इस रूट पर करीब पांच किलोमीटर लंबे क्षेत्र में झुग्गीवासियों का कब्जा है. उन्होंने बताया कि बल्लभगढ़ और फरीदाबाद के बीच करीब सवा सात सौ झुग्गियां हैं.
उन्होंने बताया कि तुगलकाबाद और पलवल के बीच चौथी रेल लाइन परियोजना को रेल मंत्रालय से मंजूरी मिलने के बाद रेलवे  मार्च, 2012 तक 200 करोड़ रुपये खर्च भी कर चुकी है. जबकि इस पूरी परियोजना पर 123.90 करोड़ खर्च होने थे. अतिक्रमण की वजह से यह परियोजना कब तक पूरी होगी कहना मुश्किल है.

Thursday, March 15, 2012

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन को अपग्रेड करने के लिए नहीं मिले 150 करोड़










नई दिल्ली रेलवे स्टेशन
रेल बजट 2012-13 में नई दिल्ली रेलवे स्टेशन को अपग्रेड करने के लिए नहीं मिले 150 करोड़ रुपए.

इस बार के रेल बजट में देश के सबसे बड़े डिवीजन दिल्ली को केवल निराशा ही हाथ लगी.

इस डिविजन को कुछ गिनी-चुनी रेलगाड़ियों के परिचालन के अलावा कुछ स्वचालित सीढ़ियां लगाने के लिए धन के अलावा कुछ भी खास हाथ नहीं लगा है. इस डिवीजन की उपेक्षा का यह आलम तब है जब इस डिवीजन से केवल यात्री-किराए से ही रेलवे का प्रतिवर्ष करीब पांच सौ करोड़ रुपए का टर्नओवर होता है.

दिल्ली डिवीजन के नई दिल्ली, पुरानी दिल्ली, आनंद विहार, हजरत निजामुद्दीन और सराय रोहिला स्टेशनों से प्रतिदिन सामान्य दिनों में करीब 12 लाख और पीक सीजन में 15 लाख यात्री आवाजाही करते हैं.

सूत्रों के अनुसार नई दिल्ली स्टेशन को अपग्रेड करने के लिए 150 करोड़ रुपए चाहिए जिसे बजट में नजरअंदाज किया गया है. सूत्रों के अनुसार इसी तरह आंनद विहार और पुरानी दिल्ली स्टेशन के विकास के बारे में बजट में कोई अहमियत नहीं मिली है.

दिल्ली से पूर्व की ओर कोई भी नई गाड़ी की सैगात नहीं मिली. उत्तर रेलवे के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार दिल्ली डिवीजन में हर समय यात्रियों की दबाव रहता है. यात्रियों की हुजूम के हिसाब से यहां के स्टेशनों में उपलब्ध बुनियादी सुविधाएं काफी कम है. कई स्टेशनों पर यात्रियों को पीने का पानी भी मयस्सर नहीं होता है.

कई प्रमुख स्टेशन काफी बड़े हैं, ऐसे में स्वचाचिलत सीढ़ियों की कमी का खमियाजा यात्रियों को उठाना पड़ता है. जर्जर प्लेटफार्म व भीड़ से अटे पड़े प्रतीक्षालयों से उन्हें संतोष करना पड़ता है. डिवीजन के सभी स्टेशनों में संरचनात्मक विकास करने की जरूरत है. फंड की काफी कमी है.

नई रेलगाड़ियां : सराय रोहिला-उधमपुर एसी एक्सप्रेस (सप्ताह में तीन दिन), अजमेर- हरिद्वार (वाया दिल्ली), बांद्रा- सराय रोहिला (साप्ताहिक), सराय रोहिला- फरुखानगर (डीईएमयू), आनंद विहार- हलदिया (साप्ताहिक), जबलपुर- हजरत निजामुद्दीन, रोहतक-पानीपत पैसेंजर.

गाड़ियां जिनका विस्तार किया गया : नई दिल्ली-लुधियाना शताब्दी एक्सप्रेस, अब मोगा तक जाएगी, अमृतसर-जयपुर, अजमेर तक जाएगी, दिल्ली-ऊना, हिमाचल एक्सप्रेस अब अंदोरा तक जाएगी, दिल्ली- जिंद पैसेंजर, नरवाना तक जाएगी, जींद-सिरसा, हिसार तक जाएगी, नांगलडेम-ऊना पैसेंजर, अंदोरा तक जाएगी, दिल्ली-मुजफ्फरनगर डीईएमयू, सहारनपुर तक जाएगी

फेरों में वृद्धि: डिब्रूगढ़-चंडीगढ़, चंडीगढ़- बांद्रा, चंडीगढ़-सराय रोहिला, हजरत निजामुद्दीन- कन्याकुमारी, नई दिल्ली-रांची राजधानी एक्सप्रेस, सराय रोहिला-बीकानेर एक्सप्रेस.

एनसीआर के स्टेशन : पुरानी दर नई दर (प्रस्तावित), गाजियाबाद -5-10, फरीदाबाद -7-10, रेवाड़ी -16 -20, शामली-17 -20, सहारनपुर-24 -30.

आदर्श स्टेशन : हापुड़, मुजफ्फरनगर.

बिजलीकरण के लिए प्रस्तावित सव्रे : कुरुक्षेत्र-कैथल- नरवाना, हिसार-जाखल-लुधियाना, मुरादाबाद-अलीगढ़- बरेली-चंदौसी.

इस वर्ष तैयार होने वाले रेललाइन : उधमपुर-कटरा, कांजीगुंडा-बनिहाल, सुल्तानपुर-गुलबर्ग, खमनो-शेहोवाल, भानबेवा-गोहना, सुल्तानपुर- गुलबर्ग.